एक चुनाव, अनेक कहानियां… कहीं उम्मीदों की जीत, कहीं सपनों की हार, कहीं अपनों का साथ और कहीं अपनों से ही बिछड़ने का दर्द।
गांव की सरकार चुनने का चुनाव भले ही कुछ दिनों का होता है, लेकिन इसकी यादें कई सालों तक लोगों के दिलों में रहती हैं। पंचायती राज चुनाव यानी सरपंच का चुनाव केवल एक पद पाने की लड़ाई नहीं होता, बल्कि यह गांव के सामाजिक ताने-बाने, आपसी संबंधों, प्रतिष्ठा, विश्वास और जनभावनाओं से जुड़ा एक बड़ा घटनाक्रम होता है।
शुरुआत हुई उम्मीदों और तैयारियों के साथ
जैसे ही सरपंच चुनाव की सुगबुगाहट शुरू हुई, गांव की चौपालों पर चर्चाएं तेज होने लगीं। चाय की दुकानों से लेकर खेतों की मेड़ों तक चुनावी चर्चाओं का दौर चल पड़ा। कौन चुनाव लड़ेगा? किसके साथ कौन खड़ा होगा? किसका समर्थन किसे मिलेगा? इन सवालों ने गांव के माहौल को चुनावी रंग में रंग दिया।
कई लोगों ने वर्षों से देखे सपनों को हकीकत में बदलने की उम्मीद के साथ चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया। किसी के लिए यह सेवा का अवसर था तो किसी के लिए वर्षों की सामाजिक मेहनत का परिणाम पाने का समय।
मिलाप भी हुआ, बिखराव भी हुआ
चुनाव की सबसे बड़ी खूबी और सबसे बड़ी विडंबना यही रही कि इसने कई लोगों को करीब भी लाया और कई पुराने रिश्तों में दूरियां भी पैदा कर दीं।
जो लोग वर्षों से एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते थे, वे अलग-अलग चुनावी खेमों में नजर आने लगे। कहीं भाई-भाई के सामने खड़ा था, कहीं रिश्तेदार अलग-अलग उम्मीदवारों का समर्थन कर रहे थे, तो कहीं पुराने मित्रों के बीच भी चुनावी मतभेद दिखाई देने लगे।
कई नए परिचय बने, नए रिश्ते जुड़े और वर्षों से दूर बैठे लोग भी चुनाव के बहाने एक-दूसरे के घर पहुंचने लगे।
लेकिन यह भी सच है कि चुनाव के दौरान कही गई कुछ बातें और लिए गए कुछ फैसले दिलों में लंबे समय तक रह जाते हैं।
प्रचार का दौर और बदलता हुआ माहौल
जैसे-जैसे मतदान का दिन नजदीक आया, उम्मीदवारों और उनके समर्थकों की सक्रियता बढ़ती गई। घर-घर जनसंपर्क, बुजुर्गों से आशीर्वाद, युवाओं से संवाद और गांव के विकास के वादे चुनावी माहौल का हिस्सा बन गए।
किसी ने विकास को मुद्दा बनाया, किसी ने पुराने कार्यों को सामने रखा और किसी ने भविष्य की योजनाओं के साथ जनता के बीच अपनी बात रखी।
इस दौरान समर्थकों का उत्साह भी देखने लायक था। कोई दिन-रात मेहनत कर रहा था, कोई अपने परिचितों से संपर्क कर रहा था, तो कोई अपने उम्मीदवार के पक्ष में माहौल बनाने में जुटा था।
कहीं हंसी-खुशी का माहौल था तो कहीं तनाव और बेचैनी भी महसूस की जा रही थी।
मतदान का दिन: फैसले की घड़ी
आखिर वह दिन भी आ गया जिसका सभी को इंतजार था। मतदान केंद्रों पर लोगों की आवाजाही शुरू हुई। गांव के मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया।
उस दिन हर वोट की अपनी अहमियत थी। उम्मीदवारों की निगाहें जनता के फैसले पर टिकी थीं। किसी के चेहरे पर आत्मविश्वास था तो किसी के मन में अनगिनत सवाल।
मतदान समाप्त होने के बाद असली परीक्षा शुरू हुई—इंतजार की परीक्षा।
परिणाम: किसी के घर खुशियां, किसी की आंखों में नमी
मतगणना का समय आया तो धड़कनें तेज हो गईं। हर राउंड और हर वोट के साथ उम्मीदें बदलती रहीं।
किसी के घर जीत की खुशियां मनाई गईं, कहीं समर्थकों ने जश्न मनाया और कहीं हार का सन्नाटा छा गया।
लेकिन लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि जनता का फैसला सर्वोपरि होता है। जीतने वाले को जिम्मेदारी मिलती है और हारने वाले को आत्ममंथन का अवसर।
यह भी समझना जरूरी है कि चुनाव में हारने वाला व्यक्ति गांव से हार नहीं जाता और जीतने वाला व्यक्ति गांव का मालिक नहीं बन जाता।
अब वक्त है रिश्तों को फिर से जोड़ने का
चुनाव समाप्त हो चुके हैं। अब चुनावी प्रतिस्पर्धा को पीछे छोड़कर गांव के विकास और सामाजिक एकता की ओर आगे बढ़ने का समय है।
जो जीते हैं, उन्हें उन लोगों के लिए भी काम करना चाहिए जिन्होंने उन्हें वोट नहीं दिया। जो हारे हैं, उन्हें भी गांव के विकास में अपनी सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए।
क्योंकि सड़क, पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और गांव की दूसरी समस्याएं किसी एक खेमे की नहीं होतीं। वे पूरे गांव की होती हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि चुनाव के दौरान बनी दूरियां खत्म हों, नाराजगियां कम हों और रिश्तों में फिर से मिठास आए।
अंत में बस इतनी सी बात...
सरपंच का पद पांच साल का हो सकता है, लेकिन रिश्ते पीढ़ियों तक चलते हैं।
चुनाव में कोई जीत गया, कोई हार गया, किसी के सपने पूरे हुए तो किसी के अधूरे रह गए। लेकिन गांव तो वही है, लोग भी वही हैं और एक-दूसरे के सुख-दुख में काम आने की जरूरत भी वही है।
इसलिए जीत का घमंड नहीं और हार का बदला नहीं, बल्कि आपसी भाईचारा, सम्मान और विकास की भावना होनी चाहिए।
क्योंकि चुनाव आते-जाते रहेंगे, उम्मीदवार बदलते रहेंगे, सरपंच बदलते रहेंगे, लेकिन गांव और गांव के रिश्ते हमेशा बने रहने चाहिए।
लोकतंत्र की असली जीत तब होगी, जब चुनाव खत्म होने के बाद पूरा गांव फिर से एक परिवार की तरह साथ खड़ा दिखाई देगा।
हार-जीत तो चुनाव का हिस्सा है, लेकिन भाईचारा गांव की असली पहचान है।
